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Poems

उनकी कहानी और
हमारी 'पवित्र' दिवाली

नव नक्षत्र, वायु, जल और मिट्टी
आकाश से मिलती सूर्य देव की ऊर्जा.
प्यार से सजता संवरता
पंचमहाभूतों का यह संपूर्ण संसार.

धरती में समाए मेहनतकश हाथ
किसने दिया उन्हें अब तक साथ?
विवश-बेचारा, लिए आंखों में आंसू
पल पल कर्ज चुकाता…!
पानी संग आकार लेता दीया
दीये को पवित्र बानती सूर्य देव की जिया!

धरती का फटा सीना,
किसान-मजदूर को है जीना
तन पर उभरी पसीने की हजारों बूंदें
जैसे इत्र दिखाकर उसके बदन को रौंदे.

दीयों में जलती पसीने की बाती
चारों ओर कानों में गूंजती
नेताओं की ठहाकेदार  पाती.
नंगा बदन!
किस काम का राजा
किस काम की रानी रानी?

वो सर्दी पे सोता, गर्मी को ओढ़ता
और बारिश को नहाता
फिर भी वो बेचारा
एक दीया नही जला पाता…!
जरा सोचिए
उसका बेटा कब जश्न मना पाता?

न पूजा न अर्चना
न लक्ष्मी न महालक्ष्मी
वो भी नही कर पाता
दूर से देखता
वो मिठाई खाता…
घर में आकर बच्चा रूठ जाता.
न बही, न खाता
फिर भी वो कर्ज चुकाता.
फिर क्यों नेताओं के गीत गुनगुनाता जाता?

कतार में खड़े झुलसते हुए पौधे
उस पर इतराता कपास का मुकुट-मणि
और उसके होते नापाक सौदे…!

हवाओं के थपेड़ों से बचते बचाते
निकली उसके दीयों की बारात
टिमटिमाते तारों की सौगात…!
लौ का जगमगाता प्रकाश
मिटाता सबका विनाश…!

यही है उसकी दर्दभरी कहानी
पटाखों के साथ सबने मनाई  दिवाली.
सरहद के जवानों को भी याद किया
फिर दिल खोलकर पीया.
किसी ने कहा- वो देख रहा मियां.
वो टक-टक देख रहा था
आंखें सेक रहा था.
आंसू की लगी थी झड़ी
इतिहास बोल रहा था.
दीया तू भी जला
मैं ही क्यों? तू भी दिवाली मना!

तुम निकले हो कहां

अंधेरे में उजियारा ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

हालातों से समझौता करके आंखें भी सूख गर्इं
बेबस आंखों में आंसू ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

मिल चुके हैं कई दफा हम जाने कितने जगह
ठिकाना देख मुलाकात का ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

लाया मोगरे का गजरा मैंने एक तुम्हारे लिए
फिर दुनिया में चमन ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

बैठकर जिस अमलतास के पेड़ के तले
करते थे हम शिकवे गिले
उस पेड़ के साथ के पलों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

कुछ बेजार हो गए कई निसार हो गए
दिल के सूने बाजार में इश्क ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

हुआ करते थे हम कभी एक मैदान के छोर में
उन गुजरे फसलों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

समझा मैंने जिसे मंजिल वही निकला तंग दिल
बेवफाई के जहां में वफा ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?
माना जिसे हमने अपना दे गया वही हमको दगा

गैरों में अपनो को ढूंढने तुम निकले हो कहां?
सदियों से बिछड़ों को ढूंढने तुम निकले हो कहां?

तुम चले आओ ना...

प्यारी सी बारिश में हवा भी इतरा रही है
होकर वो मस्तानी यही गुनगना रही है
तुम चले आओ ना, मत कहो ना…ना…ना…!

तुम नहीं तो यहां सूना है सारा जहां
देख तेरी याद में ख्वाहीशें हो रहीं जवां
कर रहा है महबूब बस तेरा ही इंतजार
संग तेरे भींगने को, मैं हो रहा बेकरार.

ना जाने कब आएगा खूबसूरत वो पल
आकर मेरी बाहों में तुम जाओगी मचल
काफिला ये बूंदों का कहीं रुक न जाए
ऐसे में अगर जो एक तू न आए

अपने दीवाने को यूं तड़पाओ ना
तुम चले आओ ना, मत कहो ना…ना…ना…!

शुक्रिया जनाब जो तुम चले आए
भीनी भीनी सी संग अपने खुशबू ले आए.
लहराया फिर तुम ने अपना ये आंचल
शोर करने लगे ये दीवाने काले बादल.

इश्क की महफिल हम आओ कुछ यूं सजाएं
मौसम भी ये आज का आशिकाना हो जाए.
मदहोशी में तुम बाहों को खोल रही हो
प्यासी नजरों से तुम कुछ बोल रही हो.
हो न जाए हमसे हसीन खता हमें संभालो ना
तुम चले आओ ना, मत कहो ना…ना…ना…!

उन्हें भी तो खबर होनी
चाहिए...!

मेरे चाहने से भला क्या होता है
उन्हें भी तो महसूस होना चाहिए
एक मेरे रोने से क्या होता है
उन्हें भी तो खबर होनी चाहिए…!

मेरे हालात से वो अंजान सही
गुरूर वक्त की नजाकत ही सही
इंसान को इंसान की कदर होनी चाहिए
वक्त पे हर किसी की नजर होनी चाहिए
एक मेरे रोने से क्या होता है
उन्हें भी तो खबर होनी चाहिए…!

उनके दिल में इश्क की शमां जल जाए
अश्क मेरे लिए उनकी भी निकल आए
अपने बीमार पर एक नजर होनी चाहिए
बस उनके दिल पर मेरा बसर होना चाहिए.
एक मेरे रोने से क्या होता है
उन्हें भी तो खबर होनी चाहिए…!

इजहार-ए-उल्फत एक दिन करेंगे वो
तन्हाई में आहें भी भरेंगे वो
मेरी दीवानगी का उन पर असर होना चाहिए
आशिकों को अंजाम से बेफिकर होना चाहिए
एक मेरे रोने से क्या होता है
उन्हें भी तो खबर होनी चाहिए…!
मेरे चाहने से भला क्या होता है?
उन्हें भी तो खबर होनी चाहिए…!

कहा था जो मैंने

दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?
कहा था जो मैंने तुझसे कभी, उस बात का क्या?

आलम तो ये है रोज एक वादा करते थे वो
लेकिन वादा निभाते नहीं, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

आग लगाने को तो वो दिल में लगा देते हैं
पर वो आग बुझाते नहीं, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

सताना और तड़पाना ये फितरत में है उनकी
आंखें रो रो के बंद हो गर्इं, उस बात का क्या
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

तुम्हे क्या, तुम हो एक आकाश बादल से
हम जो ठहरे एक ही जगह, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

हरकतें तुम्हारी एक दिन मार डालेंगी मुझे
हम जीयें या मरें तुम्हारे लिए उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

एक दिन जो आएगा अगर हम तुमसे ना मिले
मिट जाएंगे हम फुरकत में, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

तेवर हैं ऐसे जैसे कयामत ही ढाओगी
गुस्सा तो है बड़ा आशिकाना, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

हसीनों की अदाएं तो बड़ी जालिम होती हैं
करती हैं घायल नजरों से, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

वो बेचारा तो बस तड़पता ही रह गया
न जाने कब खाक हो गया, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

मुहब्बत है मुझे उनसे, ये खबर है उन्हें
फिर भी परवाह न करें मेरी, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

शान हो आजकल तुम हर महफिल की
हम तो रह गए बस तनहा, उस बात का क्या?
दिन तो गुजर जाता है पर रात का क्या?

ये बात किसी से कहो ना...

मुझे तुमसे इतना प्यार है
ये बात किसी से कहो ना
दो धड़कते दिलों का राज है
ये बात किसी से कहो ना.

तुम्हे दिल दिया है
तुम्हे जां भी देंगे
तुम्हे तारे चाहिए
आसमां भी देंगे.

सनम तुम्हारी मांग में सिंदूर भर देंगे
ये सारा जहां तुम्हारे नाम कर देंगे.

इस कदर मुझे तेरा खुमार है
ये बात किसी से कहो ना
मुझे तुमसे इतना प्यार है
ये बात किसी से कहो ना.

शुरु हुई कहानी तो खत्म भी होगी
प्यार की अपनी कोई हर रस्म भी होगी
मुझसे जुदा अपनी जिंदगानी होगी
अपने खुदा की हम पर मेहरबानी होगी.

मेरी हर खुशी तुम पर निसार है
ये बात किसी से कहो ना
मुझे तुमसे इतना प्यार है
किसी से कहो ना…!

तेरी महफिल से उठकर...

तेरी महफिल से उठकर
हम यूं चले गए
न आहट हुई
न घबराहट हुई

फिर कुछ देर बाद
वो संदेशा आया
ॅचलो सजाते हैं फिर से महफिल
और हम बेखबर से चले गए…!

मुझे याद है वो महफिल
जो सजाई थी तुमने.
लाया था तुम्हारे लिए
मैंने मोगरे का एक गजरा
और अपनी अंखों में
तुमने लगाया था कजरा.

शान में तुम्हारी मैंने
दीप भी जलाया था
पसंद था जो तुम्हे कभी
वो गीत गुनगुनाया था.

खुमार तेरा चढा इस कदर
कि हम उसमें ढल गए.
तेरी महफिल से उठकर
हम यूं चले गए…!

बड़ा खूबसूरत था
उस रात का मंजर
देखकर तेरी हर अदा
सीने में चले थे खंजर

हमने तो बस एक
दीया ही बुझाया था
बाहों में लेकर हमें तुमने
रात को जवां बनाया था.

पूनम की रात का चांद
हमें देख मुस्कुराया था
मिलन देख हमारा
वो भी मुस्कुराया था…!

मैं जानता हूं तुम नहीं आओगी
लेकिन अपने होने का एहसास कराओगी.

देख कर मिलन हमारा
सितारे भी जल गए.
तेरी महफिल से उठकर
हम यूं चले गए…!

ये भी एक खबर है

पास तुम्हारे कोई खबर नहीं
ये भी एक खबर है.
तुम दुनिया से हो बेखबर
ये भी एक खबर है.

मन मानता ही नहीं कि
तुम्हे कुछ खबर नहीं
लेकिन सच तो यही है कि
तुम्हे इसकी भी खबर नहीं.

बैठे हो बन के तुम बेखबर
ये भी एक खबर है
तुम दुनिया से हो बेखबर
ये भी एक खबर है.

चर्चा तो ये भी है शहर में
नजर है तुम्हारी हर खबर में
फिर कौन सी है वो खबर
जो नहीं है तुम्हारी नजर में?
करे ना असर तुम पे कोई खबर
ये भी एक खबर है.

तुम दुनिया से हो बेखबर
ये भी एक खबर है
पास तुम्हारे कोई खबर नहीं
ये भी एक खबर है.
तुम दुनिया से हो बेखबर
ये भी एक खबर है.